*छह महीने की मोहलत खत्म, फिर कोर्ट की दस्तक… स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया को अवमानना नोटिस


रवि कुमार अग्रवाल...(बिलासपुर)। अदालत का आदेश सिर्फ कागज का एक निर्देश नहीं होता, उसकी तय समयसीमा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के एक मामले में अब यही सवाल प्रशासन के सामने खड़ा हो गया है। कोर्ट के निर्देश के बावजूद निर्धारित अवधि में मामला नहीं निपटाने के आरोप में स्वास्थ्य विभाग के सचिव अमित कटारिया को अवमानना नोटिस जारी किया गया है।

मामला गरियाबंद के CMHO कार्यालय में पदस्थ ड्राइवर दायसिंह ध्रुव के तबादले से जुड़ा है। गरियाबंद कलेक्टर ने उनका तबादला मैनपुर कर दिया था। इस आदेश को चुनौती देते हुए दायसिंह ध्रुव ने बिलासपुर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।


कोर्ट ने छह महीने का दिया था समय

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्वास्थ्य विभाग के सचिव को निर्देश दिया था कि याचिकाकर्ता के अभ्यावेदन का निर्धारित आधारों पर छह महीने के भीतर निराकरण किया जाए। कोर्ट ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के एसके नौशाद रहमान बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में दिए गए न्याय दृष्टांत का भी उल्लेख किया था।

लेकिन याचिकाकर्ता की ओर से आरोप लगाया गया कि छह महीने की समयसीमा बीत जाने के बाद भी उनके आवेदन पर फैसला नहीं हुआ और तबादला आदेश भी निरस्त नहीं किया गया।


आदेश के बाद भी फैसला नहीं, तो पहुँचा मामला फिर अदालत

जब प्रशासनिक स्तर पर तय समय में कार्यवाही नहीं हुई, तो दायसिंह ध्रुव की ओर से दोबारा हाईकोर्ट का रुख किया गया। अधिवक्ता अभिषेक पाण्डेय और ऋषभदेव साहू के माध्यम से अवमानना याचिका दाखिल की गई।

याचिका में आरोप लगाया गया कि हाईकोर्ट के स्पष्ट निर्देश के बावजूद आदेश का निर्धारित समय में पालन नहीं किया गया। इसके बाद कोर्ट ने स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया को नोटिस जारी कर पूछा है कि न्यायालय के आदेश की अवहेलना के लिए उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए ?


अब असली नजर जवाब पर

इस मामले में फिलहाल अवमानना का दोष तय नहीं हुआ है। कोर्ट ने सिर्फ संबंधित अधिकारी से जवाब मांगा है। अब स्वास्थ्य सचिव की ओर से दिए जाने वाले जवाब और उसमें बताई जाने वाली वजहों पर आगे की न्यायिक कार्यवाही निर्भर करेगी।

मामले से जुड़े दस्तावेजों में हाईकोर्ट के 16 अक्टूबर 2025 के रिट आदेश और 23 जुलाई 2026 के अवमानना मामले में पारित आदेश का उल्लेख है।


यानी सवाल सिर्फ एक तबादले का नहीं है—सवाल यह भी है कि जब अदालत किसी मामले को तय समयसीमा में निपटाने का आदेश देती है, तो उस समयसीमा की जवाबदेही आखिर किसकी है ? अब इसका जवाब कोर्ट में देना होगा।

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