नरेन्द्र पाण्डेय : श्रवण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को हम नाग पंचमी के तौर पर मनाते है . हमारे भारतीय सनातन दर्शन में प्रत्येक त्यौहार को मनुष्य के स्वास्थ्य से जोड़ा गया है . भारत की ज्ञान परंपरा ने स्वास्थ्य को कभी केवल बीमारी के न होने के रूप में नहीं देखा। हमारे आचार्यों ने स्वास्थ्य को जीवन की गुणवत्ता, प्रकृति के साथ सामंजस्य, मन की शांति और शरीर के संतुलन से जोड़ा। इसी व्यापक दृष्टि के महान आचार्य हैं—आचार्य चर। आज आचार्य चरक की जयंती पर हम उन्हें कोटि-कोटि नमन करते है . और आज नाग पंचमी भी है इस दिन को सामान्यतः नाग पूजा के पर्व के रूप में जाना जाता है। भारत की परंपरा में प्रकृति केवल संसाधन नहीं है। वह जीवन का सहचर है।
सर्प भी इसी पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा है। खेतों और प्राकृतिक परिवेश में उसकी अपनी भूमिका है। वह खाद्य श्रृंखला और पारिस्थितिक संतुलन का हिस्सा है।नाग का सम्मान हमे प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की भावना भी देती है।और यही बात आयुर्वेद की मूल भावना से जुड़ती है। क्योंकि जिस मनुष्य का स्वास्थ्य प्रकृति से अलग हो जाए, उसका जीवन भी असंतुलित होने लगता है।
आज मनुष्य के पास अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाएं हैं, लेकिन साथ ही जीवनशैली से जुड़ी अनेक समस्याएं भी बढ़ रही हैं। अनियमित भोजन, अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ, शारीरिक निष्क्रियता, देर रात तक जागना, तनाव, लगातार स्क्रीन का उपयोग और प्रकृति से बढ़ती दूरी हमारे जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। हम दिन-रात कृत्रिम रोशनी में रहते हैं, मौसम की परवाह किए बिना जीवनचर्या चलाते हैं और शरीर के संकेतों को अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। चरक की दृष्टि में यह महत्वपूर्ण प्रश्न है - हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्।”
अर्थात् आयुर्वेद उस जीवन का विवेचन करता है जिसमें क्या हितकर है और क्या अहितकर, क्या सुखद है और क्या दुखद, तथा जीवन के लिए क्या हितकारी और क्या अहितकारी है।आज आधुनिक जीवन में स्वास्थ्य की हमारी समझ अक्सर अस्पताल, जांच रिपोर्ट और दवाओं तक सीमित हो जाती है। बीमारी हुई तो उपचार खोजा, रिपोर्ट सामान्य आई तो स्वयं को स्वस्थ मान लिया।
लेकिन चरक की दृष्टि इससे कहीं व्यापक है। स्वास्थ्य का प्रश्न यह भी है कि हम क्या खाते हैं? कब खाते हैं? कितना खाते हैं? कैसे सोते हैं? हमारी दिनचर्या कैसी है? हमारी मानसिक स्थिति कैसी है? हम प्रकृति और ऋतु के साथ कितना तालमेल रखते हैं? आयुर्वेद हमें बताता है कि स्वास्थ्य जीवनशैली से निर्मित होता है और रोग केवल शरीर में नहीं, हमारी जीवन-पद्धति में भी जन्म ले सकता है। यही कारण है कि चरक परंपरा में आहार, विहार, ऋतुचर्या, दिनचर्या, निद्रा, मानसिक संतुलन और सदाचार को महत्व दिया गया।
नाग का उल्लेख होते ही हमारे मन में विष का विचार आता है। लेकिन आज के संदर्भ में विष केवल सांप के शरीर में मौजूद विष नहीं है। हमारे जीवन में भी कई प्रकार के विष हैं—अत्यधिक क्रोध, तनाव, ईर्ष्या, नकारात्मकता, असंयमित भोजन, नशे की आदत और लगातार बढ़ती मानसिक उत्तेजना। शरीर में जाने वाला हर पदार्थ स्वास्थ्य को प्रभावित करता है, लेकिन मन में प्रवेश करने वाली हर भावना भी हमारी जीवनशैली और व्यवहार को प्रभावित करती है। इसीलिए स्वास्थ्य का अर्थ केवल शरीर का उपचार नहीं है। शरीर का संतुलन, मन का संतुलन और जीवन का संतुलन—तीनों आवश्यक हैं।
भगवान शिव के गले में नाग और नीलकंठ का प्रतीक हमें इसी दिशा में सोचने का अवसर देता है—जीवन में विष आएगा, लेकिन उसे अपने भीतर फैलने देना या उसे साधना, यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है।आचार्य चरक का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है कि चिकित्सा का उद्देश्य केवल रोगी का उपचार करना नहीं, बल्कि स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना भी है। यह विचार आज preventive healthcare के रूप में फिर से महत्वपूर्ण हो रहा है।
आज दुनिया lifestyle diseases की चुनौती से जूझ रही है। ऐसे समय में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता, संतुलित आहार, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद, मानसिक स्वास्थ्य और प्रकृति के साथ संतुलित जीवन अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाते हैं।यहां आयुर्वेद की परंपरा आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान के साथ संवाद कर सकती है।
लेकिन इस संवाद का अर्थ यह नहीं कि हर आधुनिक चिकित्सा पद्धति को नकार दिया जाए या हर पारंपरिक दावे को बिना प्रमाण स्वीकार कर लिया जाए। सच्चा समन्वय वही है जिसमें परंपरा से ज्ञान लिया जाए और आधुनिक विज्ञान से प्रमाण एवं परीक्षण की कसौटी। आचार्य चरक की जयंती और नागपंचमी का यह संयोग हमें एक व्यापक संकल्प दे सकता है— हम अपने शरीर को केवल रोग होने पर याद नहीं करेंगे। हम भोजन को केवल स्वाद नहीं, स्वास्थ्य का आधार मानेंगे। हम प्रकृति को केवल उपयोग की वस्तु नहीं, जीवन का सहचर समझेंगे। हम अपने मन के तनाव और भावनाओं को भी स्वास्थ्य का हिस्सा मानेंगे। हम ऋतु के अनुसार अपनी दिनचर्या और आहार में आवश्यक बदलाव करने का प्रयास करेंगे।और सबसे महत्वपूर्ण—हम स्वास्थ्य को केवल व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज और प्रकृति के साथ जुड़ा हुआ विषय समझेंगे।
नागपंचमी हमें प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाती है और चरक हमें जीवन के प्रति विवेकशील। एक हमें सिखाती है—प्रकृति का सम्मान करो। दूसरा कहता है—जीवन में हित और अहित को पहचानो। और दोनों मिलकर एक ही बात कहते हैं— स्वस्थ मनुष्य वही है जो स्वयं के साथ, समाज के साथ और प्रकृति के साथ संतुलन में जीना सीख जाए।
चरक जयंती और नागपंचमी की शुभकामनाएं .
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