उस दिन घर में कोई झगड़ा नहीं हुआ था।
न आवाज़ ऊँची हुई थी।
न दरवाज़ा पटककर कोई बाहर गया था।
न किसी ने "अब बस..." कहा था।
फिर भी घर में एक अजीब-सा सन्नाटा था।
राघव बालकनी में बैठा था। हाथ में चाय थी, लेकिन वह कब ठंडी हो गई, उसे पता ही नहीं चला।
अंदर रसोई में नंदिनी खाना बना रही थी। बर्तन टकराने की आवाज़ आ रही थी, लेकिन उन आवाज़ों में भी कोई जीवन नहीं था।
दोनों एक ही घर में थे...
लेकिन दोनों की दुनिया अलग-अलग हो चुकी थी।
राघव को लगता था कि नंदिनी बदल गई है।
नंदिनी को लगता था कि राघव कभी उसे समझ ही नहीं पाया।
अजीब बात यह थी कि दोनों सही थे...
और दोनों गलत भी।
शादी के शुरुआती दिनों में घंटों बातें होती थीं।
"आज क्या हुआ?"
"तुम्हें क्या अच्छा लगता है?"
"चलो कहीं घूम आते हैं..."
फिर ज़िंदगी ने अपनी रफ्तार पकड़ ली।
EMI आ गई...
ऑफिस आ गया...
बच्चों की फीस आ गई...
रिश्तेदार आ गए...
मोबाइल आ गया...
और सबसे आखिर में...
दोनों के बीच की बातें चली गईं।
अब बातचीत होती थी तो सिर्फ़ ज़रूरत भर।
"दूध खत्म हो गया।"
"बिजली का बिल भर देना।"
"बेटे को ट्यूशन छोड़ देना।"
एक समय था जब दोनों एक-दूसरे के सपनों की भाषा समझते थे।
अब दोनों केवल जिम्मेदारियों की भाषा बोलते थे।
एक रात नंदिनी ने पूछा...
"तुम्हें कभी ऐसा नहीं लगता कि हम पहले जैसे नहीं रहे?"
राघव ने मोबाइल से नज़र हटाए बिना कहा...
"सबकी ज़िंदगी ऐसी ही होती है।"
बस...
यहीं सबसे बड़ी भूल हो गई।
क्योंकि हर सवाल जवाब नहीं माँगता।
कुछ सवाल सिर्फ़ यह चाहते हैं कि सामने वाला उन्हें गंभीरता से सुन ले।
हमारे यहाँ लड़कों को बचपन से सिखाया जाता है...
"ज़्यादा मत बोलो।"
"रोना कमज़ोरी है।"
"भावुक मत बनो।"
और लड़कियों को सिखाया जाता है...
"सब सहना सीखो।"
"घर बचाना तुम्हारी जिम्मेदारी है।"
"अपनी इच्छा बाद में रखना।"
नतीजा यह हुआ कि एक बोलना भूल गया...
और दूसरी अपनी बात कहना।
फिर दोनों को लगा कि दूसरा उन्हें समझता नहीं।
रिश्ते अचानक नहीं टूटते।
वे पहले चुप हो जाते हैं।
फिर औपचारिक हो जाते हैं।
फिर एक दिन ऐसा आता है कि दो लोग साथ रहते हुए भी अजनबी हो जाते हैं।
इंटिमेसी का मतलब केवल पास बैठना नहीं होता।
इंटिमेसी का अर्थ है...
बिना डर के अपनी बात कह पाना।
बिना शर्म के अपनी कमजोरी दिखा पाना।
और बिना किसी अभिनय के अपने असली रूप में स्वीकार कर लिया जाना।
आज सोशल मीडिया ने एक नया भ्रम पैदा कर दिया है।
हर कोई मुस्कुराता हुआ दिखाई देता है।
हर रिश्ता परफेक्ट लगता है।
हर तस्वीर में प्यार छलकता हुआ दिखता है।
लेकिन तस्वीरों के पीछे कितने लोग हैं जो महीनों से एक-दूसरे से दिल की बात नहीं कर पाए...
यह कोई नहीं जानता
आज लोग स्टेटस अपडेट करते हैं...
लेकिन मन की स्थिति नहीं बताते।
रोज़ "ऑनलाइन" रहते हैं...
लेकिन एक-दूसरे के जीवन से "ऑफलाइन" हो चुके हैं।
राघव और नंदिनी की कहानी का अंत किसी बड़े नाटक से नहीं हुआ।
एक दिन राघव ने पहली बार मोबाइल नीचे रखा।
उसने सिर्फ़ इतना पूछा...
"सच बताओ...
तुम खुश हो?"
नंदिनी की आँखें भर आईं।
उसे जवाब नहीं देना पड़ा।
क्योंकि कई बार आँसू वह सब कह देते हैं, जो शब्द वर्षों तक नहीं कह पाते।
उस दिन दोनों ने कोई बड़ी कसम नहीं खाई।
बस तय किया...
हर दिन दस मिनट...
सिर्फ़ एक-दूसरे के लिए।
न कोई मोबाइल...
न कोई टीवी...
न कोई शिकायत...
सिर्फ़ सुनना।
शायद रिश्ते बचाने के लिए बड़े-बड़े वादों की नहीं, छोटे-छोटे संवादों की ज़रूरत होती है।
क्योंकि प्रेम का सबसे बड़ा शत्रु न दूरी है...
न व्यस्तता...
बल्कि वह मौन है,
जो धीरे-धीरे दो लोगों के बीच दीवार बन जाता है।
याद रखिए...
रिश्ते तब नहीं टूटते जब लोग बोलते हैं।
रिश्ते तब टूटने लगते हैं...
जब एक बोलना छोड़ देता है,
और दूसरा सुनना।