ग्राम लोकतंत्र की धुरी और अखिल भारतीय पंचायत परिषद की भूमिका


नरेन्द्र पाण्डेय : भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था केवल संसद और विधानसभाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी असली ताकत गांवों में बसती है। इसी सोच को साकार रूप देने के लिए 1958 में अखिल भारतीय पंचायत परिषद का गठन हुआ—एक ऐसा मंच, जिसने पंचायतों को राष्ट्रीय पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

परिषद की स्थापना में बलवंत राय मेहता की केंद्रीय भूमिका रही, जिन्हें पंचायती राज व्यवस्था का प्रमुख वास्तुकार माना जाता है। उनकी अध्यक्षता में गठित समिति की सिफारिशों ने देश में तीन-स्तरीय पंचायत प्रणाली की नींव रखी।

वहीं जयप्रकाश नारायण ने “ग्राम स्वराज” और जनभागीदारी के सिद्धांतों को मजबूत करते हुए इस विचारधारा को जन-आंदोलन का स्वरूप दिया।

अखिल भारतीय पंचायत परिषद का मूल उद्देश्य रहा है—

* पंचायतों को सशक्त और संगठित करना

* ग्रामीण प्रतिनिधियों को राष्ट्रीय मंच प्रदान करना

* सरकार और पंचायतों के बीच सेतु बनाना

विकास योजनाओं को जमीनी स्तर तक प्रभावी ढंग से पहुँचाना

यह संगठन लोकतंत्र को “नीचे से ऊपर” मजबूत करने की सोच पर कार्य करता है।

जब तक भारत का गांव मजबूत नहीं होगा, तब तक लोकतंत्र की नींव भी पूरी तरह मजबूत नहीं हो सकती—और इसी सच्चाई को जीवंत बनाए रखने का कार्य यह परिषद निरंतर कर रही है।


परिषद के शुरुआती दौर में बलवंत राय मेहता जैसे दूरदर्शी नेतृत्व ने इसकी दिशा तय की। समय के साथ विभिन्न राज्यों और राष्ट्रीय स्तर पर कई सामाजिक व राजनीतिक व्यक्तित्व इससे जुड़े।

वर्तमान में परिषद का ढांचा बहु-स्तरीय है—

* राष्ट्रीय कार्यकारिणी

* राज्य इकाइयाँ

* जिला एवं स्थानीय स्तर पर संगठन


अखिल भारतीय पंचायत परिषद केवल एक संगठन नहीं, बल्कि भारत के लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने का एक सतत प्रयास है।

गांवों की आवाज को राष्ट्रीय मंच तक पहुँचाने और विकास को जनभागीदारी से जोड़ने का जो सपना इसके संस्थापकों ने देखा था, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

लेखक लाईफ वर्सिटी मासिक पत्रिका के संपादक और छ्ग राज्य पंचायत परिषद के प्रदेश पदाधिकारी है

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