नरेन्द्र पाण्डेय : जब विरह प्रेम से बड़ा हो जाए: ‘प्रिय प्रवास’ की राधा और कृष्ण की अनोखी कथा
क्या कभी आपने किसी ऐसे व्यक्ति को खोया है, जिसके बिना आपको लगा हो कि जिंदगी अधूरी हो गई है?
क्या कभी किसी के बिछड़ने का दर्द इतना गहरा हुआ है कि लगा हो—अब इस पीड़ा से बाहर निकलना संभव नहीं?
हम प्रेम को क्या समझते हैं?
किसी का हमारे पास होना…
उसका हर पल हमारे साथ रहना…
हमारी बात मानना…
और जब वह हमसे दूर चला जाए तो उसे वापस पाने की बेचैनी।
लेकिन अगर प्रेम का अर्थ ही बदल जाए तो?
लेकिन ज़रा सोचिए... अगर यही दर्द आपको तोड़ने के बजाय इतना बड़ा बना दे कि आप अपने दुख से ऊपर उठकर पूरी दुनिया के कल्याण की कामना करने लगें, तो?
यही वह सवाल है, जिसका उत्तर हमें लगभग एक सदी पहले लिखे गए हिंदी के एक महत्वपूर्ण महाकाव्य ‘प्रिय प्रवास’ में मिलता है।
यह सिर्फ राधा-कृष्ण के प्रेम और विरह की कहानी नहीं है।
यह उस प्रेम की कहानी है, जो अधिकार से त्याग तक,
वियोग से करुणा तक और
व्यक्तिगत पीड़ा से विश्व-प्रेम तक की यात्रा करता है।
और इस कथा में सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि कृष्ण राधा को छोड़कर क्यों चले गए?
सबसे बड़ा प्रश्न है—
राधा ने उन्हें वापस बुलाने के बजाय यह क्यों कहा—
“प्यारे जीवें जगत हित करें, गेह चाहे न आवें।”
अर्थात—
मेरे प्रिय जीवित रहें, संसार का कल्याण करें, भले ही वे मेरे पास लौटकर न आएं।
कल्पना कीजिए...
जिस व्यक्ति के लौट आने की सबसे ज्यादा प्रतीक्षा हो, उसी के लिए यह प्रार्थना करना कि वह आपके पास न लौटे, लेकिन दुनिया के काम आए।
क्या प्रेम का इससे बड़ा रूप भी कोई हो सकता है?
यहीं से शुरू होती है ‘प्रिय प्रवास’ की वह यात्रा, जो केवल कृष्ण और राधा की कथा नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर छिपी करुणा, त्याग और लोकसेवा की संभावनाओं की कथा बन जाती है।
सन् 1914 में अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा रचित ‘प्रिय प्रवास’ को हिंदी खड़ी बोली का पहला महाकाव्य माना जाता है।
कथा की शुरुआत होती है गोकुल की एक शांत, सुंदर संध्या से।
चारों ओर हरियाली है।
गाएं लौट रही हैं।
उनके खुरों से उड़ती धूल वातावरण को सुनहरा बना रही है।
कहीं बांसुरी की मधुर धुन है, तो कहीं गोप-गोपियों का उल्लास।
सब कुछ ऐसा है जैसे यह सुख कभी खत्म ही नहीं होगा।
लेकिन साहित्य की खूबसूरती यही है—
जहां सबसे ज्यादा शांति दिखाई जाती है, वहीं आने वाले तूफान की आहट छिपी होती है।
अचानक गोकुल पहुंचता है अक्रूर का रथ ।
कंस का संदेश लेकर।
मथुरा में धनुष यज्ञ का आयोजन है। कृष्ण और बलराम को बुलाया गया है।
गोकुल समझ जाता है कि यह सिर्फ निमंत्रण नहीं... एक संकट का संदेश है।
माता यशोदा का हृदय कांप उठता है।
नंद बाबा चिंतित हैं।
गोपियां बेचैन हैं।
और राधा?
राधा का प्रेम यहां पहली बार अपनी वास्तविक ऊंचाई दिखाता है।
यह प्रेम अधिकार नहीं मांगता।
यह प्रेम कृष्ण को बांधना नहीं चाहता।
यह निष्काम प्रेम है।
फिर वह दिन आता है जब कृष्ण गोकुल छोड़कर मथुरा के लिए निकलते हैं।
रथ आगे बढ़ता है...
गोकुल पीछे छूटता जाता है...
और उस रथ के पीछे उड़ती धूल के साथ जैसे गोकुल का आनंद भी चला जाता है।
कृष्ण क्यों नहीं लौटे?
कंस का वध हो जाता है।
लेकिन कृष्ण वापस गोकुल नहीं आते।
यहीं ‘प्रिय प्रवास’ एक सामान्य प्रेम कथा से ऊपर उठ जाता है।
क्योंकि कृष्ण अब केवल यशोदा के कान्हा नहीं हैं।
वे केवल राधा के प्रिय नहीं हैं।
उनके सामने अब एक बड़ा दायित्व है—
समाज, राज्य और धर्म के व्यापक हित का।
उनका व्यक्तिगत प्रेम और उनका सामाजिक कर्तव्य आमने-सामने खड़े हैं।
और कृष्ण कर्तव्य को चुनते हैं।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उन्होंने गोकुल को भुला दिया।
मथुरा के राजमहलों में रहते हुए भी उनके भीतर गोकुल जीवित है।
यमुना का किनारा...
कदंब की छांव...
ग्वाल-बाल...
माता यशोदा...
नंद बाबा...
और सबसे बढ़कर—राधा।
इसीलिए वे अपने मित्र उद्धव को गोकुल भेजते हैं।
उद्धव जो ज्ञान और तर्क के प्रतिनिधि हैं।
वे निर्गुण ब्रह्म की बात करते हैं।
लेकिन गोकुल की गोपियों के लिए कृष्ण कोई दार्शनिक अवधारणा नहीं हैं।
वे उनके जीवन हैं।
और यहीं हरिऔध एक बड़ा सवाल उठाते हैं—
क्या केवल ज्ञान मनुष्य को पूर्ण बना सकता है?
या फिर प्रेम, करुणा और संवेदना भी उतने ही आवश्यक हैं?
राधा इस प्रश्न का उत्तर अपने आचरण से देती हैं।
वह कृष्ण को वापस बुलाने की मांग नहीं करतीं।
वह अपने लिए कुछ नहीं मांगतीं।
बल्कि पवन को संदेशवाहक बनाकर कहती हैं—
कृष्ण तक मेरा संदेश पहुंचाना,
लेकिन मेरे आंसुओं से उनके रास्ते को गीला मत करना।
क्यों?
क्योंकि कृष्ण का रास्ता अब केवल राधा तक जाने वाला रास्ता नहीं है।
वह जगत के कल्याण का रास्ता है।
राधा चाहतीं तो कह सकती थीं—
कृष्ण को वापस ले आओ।
उन्हें कहो कि गोकुल उनका इंतजार कर रहा है।
मैं उनका इंतजार कर रही हूं।
लेकिन राधा ऐसा कुछ नहीं कहतीं।
वह पवन को अपना संदेशवाहक बनाती हैं।
और कृष्ण के लिए संदेश भेजती हैं।
लेकिन संदेश क्या है?
वापस आ जाओ?
नहीं।
बल्कि— कहतीं है -
“प्यारे जीवें जगत हित करें, गेह चाहे न आवें।”
अर्थात—
मेरे प्रिय जीवित रहें, संसार का हित करें, भले ही वे मेरे घर वापस न आएं।
यहां राधा प्रेमिका से आगे निकल जाती हैं।
जरा ठहरकर सोचिए…
जिसके लौटने की सबसे ज्यादा प्रतीक्षा है, उसी के लिए यह कहना कि वह लौटे या न लौटे, बस संसार के काम आए।
क्या आज के समय में प्रेम का इससे बड़ा अर्थ हम सोच सकते हैं?
यहीं से ‘प्रिय प्रवास’ हमारे लिए सिर्फ साहित्य नहीं रहता, बल्कि जीवन को देखने का एक नया नजरिया बन जाता है।
आज के दौर में यह बात शायद और ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है।
हमारे रिश्तों में प्रेम कम और अधिकार ज्यादा दिखाई देता है।
“तुम कहां हो?”
“किससे बात कर रहे हो?”
“मुझे जवाब क्यों नहीं दिया?”
“तुम मेरे साथ ऐसा कैसे कर सकते हो?”
हम प्रेम में सामने वाले को पाना चाहते हैं।
राधा प्रेम में सामने वाले को मुक्त करती हैं।
यही अंतर है—
मोह और प्रेम में।
मोह कहता है—
तुम मेरे हो।
प्रेम कहता है—
तुम सुखी रहो।
मोह कहता है—
मेरे पास रहो।
प्रेम कहता है—
जहां हो, वहां अपना श्रेष्ठ करो
राधा का दुख खत्म नहीं हुआ।
कृष्ण की याद भी खत्म नहीं हुई।
वियोग भी समाप्त नहीं हुआ।
लेकिन उनके दुख का अर्थ बदल गया।
अब वह केवल व्यक्तिगत पीड़ा नहीं रहा।
वह करुणा बन गया।
यही इस महाकाव्य का सबसे बड़ा संदेश है—
दुख मनुष्य को दो रास्ते देता है—या तो वह उसे तोड़ दे, या फिर उसे इतना संवेदनशील बना दे कि वह दूसरों का दर्द समझने लगे।
राधा दूसरा रास्ता चुनती हैं।
और कृष्ण भी।
कृष्ण अपने व्यक्तिगत सुख का त्याग करके जनकल्याण का मार्ग चुनते हैं।
राधा अपने व्यक्तिगत प्रेम को विश्व-प्रेम में बदल देती हैं।
इसलिए ‘प्रिय प्रवास’ में कृष्ण केवल देवता नहीं हैं—वे जननायक हैं।
और राधा केवल विरहिणी नहीं हैं—वे लोकसेवा और करुणा की प्रतीक बन जाती हैं।
आज के दौर में ‘प्रिय प्रवास’ हमारे लिए जरूरी है क्योंकि
आज हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहां दुनिया पहले से कहीं ज्यादा जुड़ी हुई है। हमारे पास संवाद के अनगिनत साधन हैं।
मोबाइल है।
इंटरनेट है।
वीडियो कॉल है।
सोशल मीडिया है।
हम हजारों किलोमीटर दूर बैठे व्यक्ति से कुछ सेकंड में बात कर सकते हैं।
लेकिन सवाल यह है—
क्या हम पहले से ज्यादा करीब आए हैं या सिर्फ ज्यादा जुड़े हुए दिखाई देते हैं?
आज प्रेम अक्सर प्राप्ति और अधिकार से जुड़ गया है।
“तुम मेरे हो।”
“तुम मुझे छोड़कर कैसे जा सकते हो?”
“तुमने मुझे जवाब क्यों नहीं दिया?”
लेकिन ‘प्रिय प्रवास’ प्रेम की एक दूसरी परिभाषा देता है—
अगर तुम मेरे पास नहीं हो, फिर भी तुम्हारा जीवन सार्थक हो रहा है, तो मेरा प्रेम सार्थक है।
यही प्रेम को अधिकार से त्याग बनाता है।
यही विरह को पीड़ा से तपस्या बनाता है।
क्या हम प्रेम में दूसरे को स्वतंत्र देख सकते हैं?
क्या हम किसी अपने की खुशी के लिए अपना दुख स्वीकार कर सकते हैं?
क्या हम अपने व्यक्तिगत दर्द को किसी बड़े उद्देश्य में बदल सकते हैं?
जिंदगी में दुख हर किसी के हिस्से में आता है।
वियोग भी आता है।
असफलता भी आती है।
अपनों से दूरी भी आती है।
लेकिन फर्क सिर्फ इतना है—
कोई उसी दुख में टूट जाता है…
और कोई उसी दुख को अपनी चेतना की आग बना लेता है।
शायद इसीलिए ‘प्रिय प्रवास’ आज भी प्रासंगिक है।
क्योंकि यह हमें कृष्ण से ज्यादा राधा का प्रश्न पूछने के लिए मजबूर करता है—
क्या हम जिसे प्रेम कहते हैं, उसमें केवल अपना सुख खोजते हैं... या कभी दूसरे के सुख के लिए अपना सुख छोड़ने का साहस भी रखते हैं?
शायद जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता वहीं से शुरू होती है—
जब हमारा अपना दुख, किसी और के लिए करुणा बन जाए। और जब करुणा जीवन का उद्देश्य