क्या राजनीति सचमुच जहरीली हो गई है


नरेन्द्र पाण्डेय : भारतीय राजनीति इस समय शब्दों की आग में तप रही है। संसद से लेकर सड़क तक, चुनावी मंच से लेकर सोशल मीडिया तक—भाषा का तापमान बढ़ा हुआ है। आरोप हैं, प्रत्यारोप हैं, व्यक्तिगत हमले हैं, और हर बयान के पीछे एक राजनीतिक रणनीति है।

ऐसा नहीं है कि राजनीति में तीखापन पहली बार आया हो। इतिहास गवाह है कि वैचारिक संघर्ष हमेशा प्रखर रहे हैं। लेकिन आज जो बदलाव दिखाई देता है, वह है—संवाद का स्थान नैरेटिव ने ले लिया है। मुद्दों की गहराई की जगह अब भावनात्मक फ्रेमिंग हावी है।

आज राजनीति में सबसे बड़ा संघर्ष विचारों का कम और छवि का अधिक है। किसी भी घटना को इस तरह प्रस्तुत किया जाता है कि वह समर्थकों की भावनाओं को सक्रिय करे।

एक पक्ष दूसरे को लोकतंत्र के लिए खतरा बताता है, तो दूसरा पक्ष पहले को विकास और स्थिरता के लिए बाधा कहता है। यह द्वंद्व केवल नीति-निर्माण का नहीं, बल्कि नैतिक श्रेष्ठता का युद्ध बन जाता है।

जब राजनीति “हम बनाम वे” की संरचना में ढल जाती है, तो भाषा स्वतः कठोर हो जाती है। संवाद की जगह प्रतिरोध ले लेता है।

चुनावी गणित की दृष्टि से ध्रुवीकरण कई बार लाभकारी माना जाता है। स्पष्ट रेखाएँ समर्थकों को संगठित करती हैं।

डिजिटल प्लेटफॉर्म इस प्रक्रिया को और तेज़ करते हैं।

  • तीखा बयान तुरंत वायरल होता है।
  • संयमित विश्लेषण अक्सर ट्रेंड नहीं करता।
  • बहस की जगह टकराव दृश्यता पाता है।

इसका परिणाम यह होता है कि राजनीति का स्वर अधिक धारदार दिखाई देने लगता है—और कई बार जानबूझकर बनाया भी जाता है। हाल के दिनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के बीच तीखा राजनीतिक टकराव देखने को मिला है।

राहुल गांधी ने संसद और सार्वजनिक मंचों पर आरोप लगाए कि सरकार संस्थाओं को कमजोर कर रही है और लोकतांत्रिक संरचनाओं पर दबाव बना रही है। उन्होंने विदेश नीति से लेकर आर्थिक असमानता और संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता तक कई मुद्दों पर सीधे सवाल उठाए।

दूसरी ओर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष पर “नकारात्मक राजनीति” का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि देश की उपलब्धियों को वैश्विक मंच पर कमतर दिखाना राष्ट्रहित के विरुद्ध है। उनके भाषणों में विपक्ष पर विकास में बाधा डालने और भ्रम फैलाने का आरोप स्पष्ट रूप से उभरा।

यह टकराव केवल दो व्यक्तियों के बीच नहीं है। यह दो राजनीतिक दृष्टिकोणों के बीच है—

  • एक जो सत्ता की स्थिरता और राष्ट्रीय उपलब्धियों को केंद्र में रखता है।
  • दूसरा जो संस्थागत संतुलन और जवाबदेही पर जोर देता है।

लेकिन जब यह वैचारिक टकराव व्यक्तिगत आरोपों और व्यंग्य में बदल जाता है, तो राजनीति का स्वर और कठोर हो जाता है।

आज हर बयान क्लिप में बदलता है।

हर क्लिप ट्रेंड बन सकती है।

और हर ट्रेंड एक धारणा गढ़ सकता है।

सोशल मीडिया का एल्गोरिदम संतुलन नहीं, प्रतिक्रिया को पुरस्कृत करता है। इसलिए भाषा में उत्तेजना बढ़ती है। यही कारण है कि राजनीति का तापमान वास्तविकता से अधिक प्रतीत होता है।

लोकतंत्र में असहमति आवश्यक है। तीखी आलोचना भी लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन जब आलोचना शत्रुता में बदल जाए और हर चुनाव अस्तित्व की लड़ाई की तरह प्रस्तुत किया जाए, तो संवाद की गुणवत्ता प्रभावित होती है।

वर्तमान दौर में राजनीति का स्वर इसलिए अधिक उग्र लगता है क्योंकि—

  • राजनीतिक दांव ऊँचे हैं,
  • चुनावी प्रतिस्पर्धा तीव्र है,
  • और डिजिटल युग में हर शब्द स्थायी रिकॉर्ड बन जाता है।

राजनीति का माहौल केवल नेताओं से तय नहीं होता।

  • मतदाता किस प्रकार की भाषा को स्वीकार करता है,
  • मीडिया किस प्रकार की बहस को प्राथमिकता देता है,
  • और समाज किस तरह की प्रतिक्रिया देता है—
  • इन सबका प्रभाव पड़ता है।

यदि समाज संवाद की गहराई को महत्व देगा, तो राजनीति भी संयमित होगी। यदि उत्तेजना को पुरस्कृत किया जाएगा, तो वही शैली स्थायी हो जाएगी।

राजनीति पूरी तरह जहरीली हो गई है—यह कहना अतिशयोक्ति होगी।

लेकिन यह कहना भी गलत नहीं कि उसका स्वर अधिक आक्रामक हुआ है।

वर्तमान विवादों में हम दो बड़े नेताओं को आमने-सामने देखते हैं, पर असल में यह संघर्ष विचारधाराओं, दृष्टिकोणों और सत्ता की दिशा को लेकर है।

लोकतंत्र की शक्ति इसी में है कि वह टकराव को भी संस्थागत मर्यादा में समेट सके।

प्रश्न यह नहीं कि राजनीति कितनी जहरीली है।

प्रश्न यह है कि हम उसे किस दिशा में ले जाना चाहते हैं।

और इसका उत्तर केवल संसद में नहीं—समाज के भीतर भी तय होगा।


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