नरेन्द्र पाण्डेय (लाईफ वर्सिटी ) :-
सरकार के लिए एक पक्का मकान एक योजना की उपलब्धि हो सकता है, लेकिन उस मकान के भीतर रहने वाले परिवार के लिए यह पूरी जिंदगी बदल देने वाला सपना होता है। सवाल यही है कि ऐसे कितने सपने सच हो रहे हैं?
राजनीतिक मंचों पर विकास के आंकड़े गिनाना आसान है। योजनाओं की लंबी सूची बताना भी आसान है। लेकिन विकास की असली तस्वीर प्रेस विज्ञप्तियों, सरकारी दावों या राजधानी के मंचों पर नहीं मिलती। वह तस्वीर प्रदेश के उस दूरस्थ गांव में दिखाई देती है, जहां आज भी एक परिवार पक्के घर, नल के पानी, रसोई गैस और सम्मानजनक जीवन को अपनी सबसे बड़ी जरूरत मानता है।
छत्तीसगढ़ सरकार आज ‘सुशासन’ और ‘अंतिम व्यक्ति तक विकास’ को अपनी प्राथमिकता बता रही है। मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जैसे दूरस्थ इलाकों में मंत्रियों का पहुंचना और हितग्राहियों से सीधे संवाद करना इसी दावे की जमीन पर पड़ताल करने की कोशिश है।
माड़िंग पिड़िंग भूर्सा गांव में इन्द्र कुमार के निर्माणाधीन मकान की कहानी इस तस्वीर का एक छोटा-सा हिस्सा है। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पक्का घर, मनरेगा से रोजगार, उज्ज्वला से गैस, जल जीवन मिशन से नल का पानी और महतारी वंदन योजना से महिलाओं को आर्थिक सहायता—सरकार की कई योजनाएं जब एक ही परिवार तक पहुंचती हैं तो यह महज सरकारी योजनाओं का जोड़ नहीं रहता, बल्कि कल्याणकारी शासन की वास्तविक परीक्षा बन जाता है।
लेकिन यहीं से पत्रकारिता का सबसे जरूरी सवाल भी जन्म लेता है—
क्या एक परिवार की बदली हुई जिंदगी को पूरे प्रदेश के बदलाव का पैमाना माना जा सकता है?
अगर सरकार सचमुच सुशासन को अपनी पहचान बनाना चाहती है तो उसे सिर्फ यह नहीं बताना होगा कि कितने मकान स्वीकृत हुए, कितने कनेक्शन दिए गए और कितनी राशि बांटी गई। उसे यह भी बताना होगा कि कितने मकान पूरे हुए, कितने घरों में नियमित पानी पहुंच रहा है, कितने परिवार आज भी योजनाओं से बाहर हैं और कितने लोगों को अपना अधिकार पाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।
यही वह फर्क है, जो सरकारी योजना और सुशासन के बीच की दूरी तय करता है।
छत्तीसगढ़ के सामने आज विकास का बड़ा सपना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य के साथ मुख्यमंत्री विष्णु देव साय सरकार ‘विकसित छत्तीसगढ़’ की दिशा में आगे बढ़ने का दावा कर रही है। सेवा ज्योति यात्रा, सेवा संकल्प अभियान और ‘छत्तीसगढ़ अंजोर विजन @2047’ इसी बड़े नैरेटिव का हिस्सा हैं।
लेकिन विकसित छत्तीसगढ़ का अर्थ केवल बड़े निवेश, बड़े उद्योग और बड़े मंच नहीं हो सकता।
विकसित छत्तीसगढ़ की पहली पहचान उस गांव से होगी, जहां गरीब को पक्का घर मिले, किसान को बेहतर आय मिले, युवा को रोजगार मिले, महिला आर्थिक रूप से मजबूत हो और सरकारी सेवा पाने के लिए किसी सिफारिश की जरूरत न पड़े।
यही सुशासन की असली कसौटी है।