इजराइल की राजनीति में नया मोड़, अरब दल तय करेंगे अगली सरकार की दिशा


नरेन्द्र पाण्डेय : इजराइल की राजनीति में आए ताजा चुनावी नतीजे केवल सत्ता परिवर्तन या गठबंधन की संभावनाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उन्होंने देश की राजनीतिक व्यवस्था के सामने एक नई चुनौती और नई संभावना दोनों खड़ी कर दी हैं। 120 सीटों वाली इजराइली संसद में न तो प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू के गठबंधन को बहुमत मिला और न ही यहूदी विपक्ष अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में पहुंच पाया। लेकिन इन चुनावों का सबसे दिलचस्प पहलू दो अरब राजनीतिक गठबंधनों का अप्रत्याशित प्रदर्शन है, जिन्होंने मिलकर रिकॉर्ड 19 सीटें हासिल की हैं।

यह परिणाम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अब तक इजराइल की राजनीति में अरब दलों की भूमिका अक्सर सीमित प्रभाव वाली मानी जाती रही है। लेकिन इस बार जनादेश ने उन्हें सत्ता के समीकरणों के केंद्र में ला खड़ा किया है। सवाल यह है कि क्या इजराइल की अगली सरकार के गठन में वे केवल समर्थन देने वाली राजनीतिक ताकत बनेंगे या देश की नीतियों को प्रभावित करने वाली निर्णायक शक्ति भी साबित होंगे?

नेतन्याहू लंबे समय से इजराइल की राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरों में रहे हैं। उनकी राजनीति का आधार राष्ट्रवाद, सुरक्षा और मजबूत नेतृत्व का दावा रहा है। लेकिन इस बार मतदाताओं ने किसी एक राजनीतिक धड़े को स्पष्ट बहुमत नहीं दिया। यह परिणाम बताता है कि इजराइली समाज के भीतर राजनीतिक प्राथमिकताओं और नेतृत्व को लेकर मतभेद गहरे हैं।

दूसरी ओर, अरब दलों का 19 सीटों तक पहुंचना इजराइल के लोकतांत्रिक विमर्श में एक महत्वपूर्ण संकेत है। यह केवल सीटों की संख्या नहीं, बल्कि उस आबादी की राजनीतिक भागीदारी और प्रतिनिधित्व का संदेश भी है, जिसकी आवाज लंबे समय से इजराइल की सत्ता की मुख्यधारा में अपेक्षाकृत कमजोर रही है।

हालांकि, इन दलों के सामने भी कम चुनौतियां नहीं हैं। अरब राजनीतिक दलों और यहूदी राजनीतिक दलों के बीच फिलिस्तीन, राष्ट्रीय सुरक्षा, नागरिक अधिकारों और इजराइल की पहचान जैसे मुद्दों पर गंभीर मतभेद रहे हैं। ऐसे में सरकार गठन के लिए समर्थन देना और सरकार का हिस्सा बनना दो अलग-अलग राजनीतिक फैसले होंगे।

अब राष्ट्रपति हर्ज़ोग की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। वे सभी राजनीतिक दलों से बातचीत के बाद किसी नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करेंगे। यह प्रक्रिया कई सप्ताह तक चल सकती है। लेकिन असली परीक्षा केवल सरकार बनाने की नहीं, बल्कि उसे स्थिर बनाए रखने की होगी।

इस चुनाव का एक व्यापक संदेश भी है। लोकतंत्र में बहुमत केवल बड़ी पार्टियों के पास ही नहीं होता, कभी-कभी छोटी राजनीतिक ताकतें भी अपने जनसमर्थन के दम पर सत्ता की दिशा तय करने लगती हैं। इजराइल के मौजूदा चुनाव परिणाम इसी राजनीतिक वास्तविकता को सामने रखते हैं।

लेकिन क्या अरब दलों की यह बढ़ी हुई ताकत इजराइल में अरब नागरिकों के अधिकारों, यहूदियों और अरबों के बीच सामाजिक विश्वास तथा फिलिस्तीन के साथ संबंधों पर कोई सकारात्मक असर डाल पाएगी? या फिर सत्ता की मजबूरियां इस नए राजनीतिक अवसर को भी सीमित कर देंगी?

इजराइल के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती केवल सरकार बनाने की नहीं, बल्कि एक ऐसे समाज को राजनीतिक स्थिरता देने की है, जो सुरक्षा, पहचान, धार्मिक विचारधारा और क्षेत्रीय संघर्षों के बीच बंटा हुआ है। चुनाव ने सत्ता का रास्ता किसी एक दल के लिए आसान नहीं छोड़ा है। अब देखना यह है कि राजनीतिक दल अपने मतभेदों से ऊपर उठकर जनादेश का सम्मान करते हैं या फिर सत्ता की खींचतान इजराइल को एक और राजनीतिक अनिश्चितता की ओर ले जाती है।

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