ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी ने अपने 500 नेपाली स्टूडेंट्स हॉस्टल से निकाल दिया और छात्रों को बस में भरकर 30 किलोमीटर दूर कटक रेलवे स्टेशन पर छोड़ दिया. इनमें कई छात्राएं भी थी. साथ ही कई के पास ट्रेन के टिकट भी नहीं थे. यह मामला ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर स्थित कालिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी (KIIT) का है जहाँ एक नेपाली छात्रा की आत्महत्या के बाद उपजे हालात ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवाद खड़ा कर दिया है। इस घटना ने भारत की शैक्षणिक संस्थानों में विदेशी छात्रों की सुरक्षा, प्रशासन की जवाबदेही और छात्रों के अधिकारों पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।
दरअसल यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में नेपाल की रहने वाली बीटेक थर्ड
ईयर की स्टूडेंट प्रकृति लामसाल ने खुदकुशी कर ली थी. मामला सामने आने के बाद
कैंपस में नेपाली छात्रों के बीच तनाव फैल गया और उन्होंने विरोध प्रदर्शन शुरू कर
दिया. इसके बाद उन्हें हॉस्टल से निकाल दिया.
द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, 500
नेपाली स्टूडेंट्स को हॉस्टल से निकालकर बस में भरकर 30 किलोमीटर दूर कटक रेलवे स्टेशन पर छोड़ दिया गया. जिसमें से
कई छात्राएं भी थी और काइयों के पास तो टिकट भी नहीं था. केआईआईटी की ओर से जारी
नोटिस में कहा गया है कि नेपाल के सभी अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए यूनिवर्सिटी
अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दी गई है. उन्हें 17 फरवरी 2025 को तत्काल परिसर खाली करने
का निर्देश दिया जाता है. रिपोर्ट के अनुसार, एक छात्र ने कहा कि हमें जबरन कटक रेलवे स्टेशन पर उतार दिया गया. हमें 28 फरवरी को परीक्षा देनी थी. लेकिन मेरे पास पैसे तक नहीं
हैं. खाना भी नहीं मिला. हम असहाय हैं.
केआईआईटी के रजिस्ट्रार ने बताया है कि आत्महत्या करने वाली बीटेक थर्ड ईयर की
नेपाली छात्रा के एक अन्य छात्र के साथ प्रेम संबंध होने का संदेह है. उनके बीच
किसी बात को लेकर विवाद हुआ और फिर उसने खुदकुशी कर ली. भुवनेश्वर के डीसीपी पिनाक
मिश्रा ने कहा कि हमने एक छात्र द्वारा आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप के आधार
पर इन्फोसिटी पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज कर लिया गया है. आरोपी छात्र को हिरासत
में लेकर पूछताछ की जा रही है. मृतक छात्रा का मोबाइल फोन, लैपटॉप समेत अन्य गैजेट कब्जे में ले लिए गए हैं. इस घटना की गूंज नेपाल तक पहुंच गई. आलम यह रहा कि भारत से
नेपाल तक इस यूनिवर्सिटी को लेकर बवाल मच गया है. नेपाल की सरकार ने इस मामले की
जांच के लिए दो अधिकारी तक भारत भेज दिए हैं.
नेपाल की एक छात्रा ने आत्महत्या ने पूरे कैंपस को हिला कर रख दिया. छात्रा की
मौत के बाद यहां पढ़ने वाले नेपाली छात्र आक्रोशित हो गए और वे प्रदर्शन करने लगे.
देखते ही देखते मामला गंभीर हो गया. नेपाली छात्रों के प्रदर्शन के दौरान यूनिवर्सिटी की एक
महिला प्रोफेसर मंजूषा पांडे और कर्मचारी जयंती नाथ का छात्रों के बीच बहस हो गई.
इस वाद-विवाद का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल होने लगा. इस वीडियो में प्रोफेसर
मंजूषा पांडे यह कहते हुए दिखाई दे रही हैं कि यूनिवर्सिटी के संस्थापक 40,000
छात्रों को
मुफ्त में खाना और शिक्षा देते हैं. इस पर जयंती नाथ आगे कहते हैं कि छात्रों पर
खर्च होने वाली राशि नेपाल के राष्ट्रीय बजट के बराबर है. दोनों कर्मचारियों के इस
बयान को विदेशी छात्रों के प्रति पूर्वाग्रहपूर्ण (xenophobic) माना जा रहा है
और कहा जा रहा है कि इनके बयानों ने प्रदर्शन में आग में घी डालने का काम किया. छात्रों के विरोध और सोशल
मीडिया पर उठे बवाल के बाद, KIIT प्रशासन ने प्रोफेसर मंजूषा पांडे और जयंती नाथ को निलंबित
कर दिया और आधिकारिक रूप से माफी मांगी. विश्वविद्यालय की ओर से कहा गया, ‘हम 16 फरवरी 2025
की घटना से
बेहद आहत हैं. हमें खेद है कि हमारे कुछ सदस्यों ने आंदोलनरत छात्रों के साथ
अनुचित व्यवहार किया. हम अपने छात्रों से प्रेम करते हैं और उनके हितों की रक्षा
के लिए प्रतिबद्ध हैं, हालांकि, हमारे स्टाफ सदस्यों की टिप्पणियां व्यक्तिगत थीं और
भावनाओं के वशीभूत होकर दी गई थीं, लेकिन हम इसे उचित नहीं ठहराते. हमने उन्हें सेवा से हटा
दिया है और वे भी अपने व्यवहार के लिए क्षमा मांग चुके हैं. हम नेपाल के सभी
छात्रों और लोगों के प्रति अपना स्नेह और समर्थन व्यक्त करते हैं.’
यह पहला अवसर नहीं है जब किसी विश्वविद्यालय ने विवाद के समय छात्रों को अचानक
परिसर छोड़ने का आदेश दिया हो, लेकिन KIIT का यह कदम क्रूर और गैर-जिम्मेदाराना प्रतीत होता है। एक ओर
आत्महत्या के कारणों की जांच चल रही थी, वहीं दूसरी ओर विश्वविद्यालय ने नेपाल के सभी छात्रों को अनिश्चितकाल के लिए
निष्कासित करने का निर्णय ले लिया। इससे यह सवाल उठता है कि क्या विश्वविद्यालय
प्रशासन ने इस मामले को केवल "कानूनी संकट" के रूप में देखा और छात्रों
की वास्तविक समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया?
छात्रों को जबरन बाहर निकालने की कार्रवाई को न केवल मानवाधिकारों के उल्लंघन के रूप में देखा जा रहा है, बल्कि यह एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा भी बन गया है। नेपाल सरकार को मामले में
हस्तक्षेप करना पड़ा, और नेपाल के
प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को बयान जारी करना पड़ा।
यह घटना व्यापक रूप से उच्च शिक्षा में छात्रों की सुरक्षा और उनके अधिकारों
पर भी सवाल खड़े करती है। आत्महत्या की घटना के बाद प्रशासन को छात्रों की सुरक्षा
सुनिश्चित करनी चाहिए थी, लेकिन उन्होंने
विपरीत दिशा में जाकर उन्हें जबरन परिसर से बाहर निकाल दिया।
KIIT जैसी निजी
यूनिवर्सिटियों में विदेशी छात्रों को आकर्षित करने के लिए बड़े-बड़े दावे किए
जाते हैं, लेकिन जब वे किसी संकट में
होते हैं, तो संस्थान अपनी
जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेता है। यह घटना इस ओर भी इशारा करती है कि क्या
निजी विश्वविद्यालयों में छात्र हितों से अधिक उनकी ब्रांडिंग और छवि महत्वपूर्ण हो गई है?
इस घटना का भारत-नेपाल संबंधों पर प्रभाव पड़ सकता है ; भारत और नेपाल
ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक रूप
से घनिष्ठ संबंध रखते हैं। हजारों नेपाली छात्र भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों
में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। इस घटना के बाद नेपाल में तीखी प्रतिक्रिया देखने
को मिली है। नेपाल सरकार ने तुरंत अपने अधिकारियों को ओडिशा भेजा, जो यह दर्शाता है कि यह मामला अब सिर्फ एक विश्वविद्यालय तक
सीमित नहीं रहा, बल्कि कूटनीतिक स्तर पर भी
गंभीरता से लिया जा रहा है।
यह घटना एक महत्वपूर्ण संदेश देती है कि भारत में उच्च शिक्षा संस्थानों को
अंतरराष्ट्रीय छात्रों की सुरक्षा, कल्याण और
अधिकारों को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए।
- छात्र
सुरक्षा के स्पष्ट दिशानिर्देश
- विश्वविद्यालयों को ऐसे मामलों के लिए एक क्राइसिस मैनेजमेंट टीम बनानी चाहिए, जो विदेशी छात्रों की
सुरक्षा और समर्थन सुनिश्चित करे।
- छात्रों को अचानक निष्कासित करने जैसी
गैर-जिम्मेदाराना नीतियों पर रोक लगानी चाहिए।
- प्रशासनिक
जवाबदेही
- किसी भी आत्महत्या या हिंसा के मामले में संस्थान को
जिम्मेदारी लेनी होगी और पारदर्शी जांच प्रक्रिया अपनानी होगी।
- छात्रों को कानूनी, मानसिक स्वास्थ्य और आर्थिक सहायता प्रदान करने के
लिए समर्पित संसाधन विकसित करने की जरूरत है।
- अंतरराष्ट्रीय
छात्रों के लिए नीति सुधार
- भारत सरकार को अंतरराष्ट्रीय छात्रों की सुरक्षा
सुनिश्चित करने के लिए एक राष्ट्रीय नीति बनानी चाहिए, जिससे इस तरह के मामलों में संस्थानों की जवाबदेही तय
हो।
- विदेशी छात्रों के लिए हेल्पलाइन और
काउंसलिंग सेवाएं अनिवार्य रूप से उपलब्ध होनी चाहिए।KIIT का यह मामला केवल एक
विश्वविद्यालय की प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि भारतीय उच्च शिक्षा प्रणाली में व्याप्त गहरे
संकट का संकेत भी है। नेपाल और अन्य देशों से आने वाले छात्रों को यहां समान
अधिकार और सुरक्षा मिलनी चाहिए। यह घटना बताती है कि विश्वविद्यालयों को
केवल व्यावसायिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि एक समावेशी और उत्तरदायी संस्थान के रूप में
कार्य करना चाहिए।
यदि इस मामले से कोई सबक नहीं लिया गया, तो भविष्य में भारत में अंतरराष्ट्रीय छात्रों की सुरक्षा और विश्वास को गहरी
क्षति पहुंच सकती है।
आपको क्या लगता है कि इस घटना के पीछे सबसे बड़ी गलती किसकी थी? KIIT प्रशासन, नेपाली छात्रों या फिर स्थानीय प्रशासन की? अपने विचार हमें कमेंट में जरूर बताएं और अगर आपको यह वीडियो पसंद आया हो तो
लाइक और शेयर जरूर करें। धन्यवाद!